अखण्ड भारत
रत्नाकराधौतपदां हिमालय किरीटिनीम्।
ब्रह्मराजर्षिरत्नाढ्यां वन्दे भारतमातरम्।।
सागर जिसके चरण धो रहा है, हिमालय जिसका मुकुट है और जो ब्रह्मऋषि तथा राजऋषि रूपी रत्नों से समृद्ध है, ऐसी भारत माता की मैं वंदना करता हूँ।
वन्दे मातरम्,
वर्तमान स्वतंत्रता दिवस (परंपरागत)
15 अगस्त को पूरे देश में एक बहुत बड़ा पर्व मनाया जाता है। पूरा देश एक अद्भुत उत्सव में डूब जाता है। जगह-जगह भाषण होते हैं, कितने प्रकार के बलिदान हुए, ये बताया जाया है।
लद्दाख की बर्फीली चोटियों से लेकर केरल के शांत सागर तटों तक, संपूर्ण राष्ट्र एक सुर में 'वंदे मातरम' का उद्घोष करता है।
पंजाब के खेतों में ढोल की थाप, तो दक्षिण में शास्त्रीय संगीत, ये दोनों मिलकर देश की स्वतंत्रता का मंगल गान करते हैं।
उत्तराखंड के देवभूमि पर्वतों से लेकर ओडिशा के जगन्नाथ धाम तक, शंखनाद और जयकारों के साथ मां भारती का वंदन किया जाता है।
दूर-दराज के गांवों की पगडंडियों से लेकर महानगरों के चमचमाते राजमार्गों तक, हर मार्ग राष्ट्रभक्ति के रंगों से सज्जित होता है।
बेंगलुरु के आधुनिक तकनीकी केंद्रों से लेकर काशी के प्राचीन घाटों तक, हर स्थान पर आधुनिकता और सनातन संस्कृति का एक अनूठा संगम दिखाई देता है।
अनुसंधान केंद्रों के वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाओं से लेकर देश की सीमाओं पर तैनात सैनिकों की चौकियों तक, हर धड़कन में केवल भारत माता का नाम होता है।
बल्कि भारत में रहने वाले भारतीय ही नहीं,दुनिया के हर देश में स्थित भारतीय दूतावास (Indian Embassies)। वहाँ रहने वाले प्रवासी भारतीय भी इस कार्यक्रम में शामिल होते हैं।
- प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा फहराते हैं।
- झंडा फहराने के बाद जन गण मन गाया जाता है और 21 तोपों की सलामी दी जाती है।
- प्रधानमंत्री देश को संबोधित करते हैं और पिछले साल की उपलब्धियां बताते हैं।
- तीनों सेनाओं (थल, जल, वायु) और पुलिस के जवान मार्च पास्ट करते हैं।
- देश के अलग-अलग राज्यों की झांकियां और स्कूली बच्चों के नृत्य प्रस्तुत होते हैं।
प्रथम स्वतंत्रा दिवस (15 अगस्त 1947 एतिहासिक पल)
हम जानते हैं कि इस उत्सव की शुरुआत, 15 अगस्त 1947 के दिन हुई।
जवाहरलाल नेहरू जी ने संविधान सभा (Constituent Assembly) में अपना प्रसिद्ध भाषण दिया {'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी (Tryst with Destiny)', 'नियति के साथ मिलन (भाग्यवधू से मिलन)'}, जिसमें उन्होंने कहा था—"जब दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जागेगा"।
घड़ी का कांटा पहुंचते ही शंख बजाकर और मेज थपथपाकर भारत की आजादी का स्वागत किया गया।
दिल्ली के वायसराय हाउस (अब राष्ट्रपति भवन) और काउंसिल हाउस (पुराना संसद भवन) के बाहर भोर में ही हजारों लोगों की भारी भीड़ जमा होने लगी थी।
हल्की-हल्की बारिश होने लगी, जिससे दिल्ली का मौसम सुहावना हो गया। लोग सड़कों पर वंदे मातरम और 'जय हिंद' के नारे लगाते हुए निकलने लगे।
वायसराय हाउस के भव्य दरबार हॉल में आधिकारिक समारोह शुरू हुआ। लॉर्ड माउंटबेटन ने स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल के रूप में शपथ ली। इसके तुरंत बाद, गवर्नर-जनरल माउंटबेटन ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई। नेहरू जी के साथ उनके कैबिनेट मंत्रियों (जैसे सरदार वल्लभभाई पटेल) ने भी शपथ ली।
काउंसिल हाउस (अब पुराना संसद भवन) के ऊपर से ब्रिटिश झंडा 'यूनियन जैक' उतारा गया। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आधिकारिक रूप से भारत का तिरंगा झंडा फहराया। 21 तोपों की सलामी दी। वहां मौजूद सभी नेताओं और जनता ने खड़े होकर तिरंगे को सलामी दी। (ध्यान दें: लाल किले पर पहला ध्वजारोहण अगले दिन यानी 16 अगस्त 1947 की सुबह हुआ था)।
नेहरू कैबिनेट के सभी मंत्रियों ने लॉर्ड माउंटबेटन को एक आधिकारिक विदाई लंच (राजकीय भोज) दिया, जहां भारत के भविष्य और दोनों देशों के रिश्तों पर चर्चा हुई।
इंडिया गेट के पास स्थित प्रिंसेस पार्क में सबसे बड़ा सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। यहाँ एक विशाल मैदान में झंडा फहराया जाना था। सरकार को उम्मीद थी कि करीब 30 से 50 हजार लोग आएंगे, लेकिन वहां 5 लाख लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। भीड़ इतनी जबरदस्त थी कि नेहरू जी और माउंटबेटन की गाड़ियां मंच तक नहीं पहुंच पायीं। नेहरू जी जनता के ऊपर से होते हुए मंच तक पहुंचे, माउंटबेटन अपनी बग्गी से नीचे उतर ही नहीं पाए। नेहरू जी ने भीड़ के बीच से ही हाथ हिलाकर लोगों का अभिवादन किया।
जैसे ही शाम को तिरंगा फहराया गया, तो अचानक बादलों के बीच से सूर्य निकला और आसमान में एक भव्य इंद्रधनुष बन गया, जिसे लोगों ने नए भारत के सुनहरे भविष्य का शुभ संकेत माना।
वायसराय हाउस में एक भव्य राजकीय रात्रिभोज (State Banquet) का आयोजन हुआ।
दिल्ली की सभी प्रमुख सरकारी इमारतें रोशनी (Illumination) से जगमगा रही थीं, अलग-अलग जगह से आए लोग और पूरी दिल्ली, सड़कों पर उमड़ी हुई थी।
इतिहास का स्मरण आवश्यक
"साथियों, जब हम भारत के इस गौरवशाली और सुखद इतिहास का स्मरण करते हैं, तो हमारा हृदय आत्मगौरव और स्वाभिमान से भर उठता है। परंतु हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि इसी सुखद इतिहास के साथ ही, इसी इतिहास से जुड़ा हुआ एक ऐसा हिस्सा भी है जो अत्यंत पीड़ादायक है। हमारे इतिहास में ऐसी कई भयंकर घटनाएं घटित हुई हैं जो आज भी हमारे हृदयों को गहरी पीड़ा पहुँचाती हैं। भूतकाल में हमसे कई ऐसी भयंकर भूलें हुईं, जो कदापि नहीं होनी चाहिए थीं। परंतु हमें उन अप्रिय घटनाओं और उन ऐतिहासिक भूलों को भी स्मरण करना ही चाहिए। यह ठीक नहीं कि हम केवल अच्छा-अच्छा ही सुनते रहें और सुखद बातों में खोए रहें। हमारे देश के इतिहास में हमारे द्वारा कौन-कौन सी गलतियाँ हुईं, यदि हम उन्हें ध्यान में नहीं रखेंगे, तो यह हमारी बहुत बड़ी भूल होगी। इतिहास की उन कड़वी सीखों को याद रखना इसलिए आवश्यक है ताकि हम इतिहास की उन गलतियों से सीखें और जिन्होंने इस स्वतंत्रता में संघर्ष किया, बलिदान दिया वह व्यर्थ न जाए "
कहते हैं - "Those who do not know their history, they lose their existence." जो देश, जो समाज अपने इतिहास से कुछ सीखता नहीं, प्रेरणा नहीं लेता , याद नहीं रखता, भूल जाता है। वो देश, वो समाज - स्वयं इतिहास बन जाता है। वह फिर संग्रहालय (म्यूज़ियम) की शोभा बन जाता है जैसे -
- यूनान = Greek सभ्यता - सुकरात, सिकंदर वाली - मिट गई
- मिस्र = Egypt सभ्यता - पिरामिड वाली - मिट गई
- रोमा = Rome सभ्यता - रोम की सभ्यता - मिट गई
मतलब - दुनिया की सबसे बड़ी पुरानी सभ्यताएं खत्म हो गईं।
इसलिए हमारे इतिहास में क्या-क्या हुआ, इसकी सही जानकारी हमारे पास होना चाहिए। विशेषकर युवाओं को।
Tryst With Destiny
14, 15 अगस्त की मध्य रात्री को जब नेहरू जी ने अपना एतिहासिक भाषण दिया(Tryst with Destiny या 'नियति के साथ मिलन')।
उसमें कहा - "हमने नियति को मिलने का एक वचन दिया था और अब समय आ गया है कि हम अपने वचन को निभाएँ, पूरी तरह न सही, लेकिन बहुत हद तक।"
(Long years ago we made a tryst with destiny, and now the time comes when we shall redeem our pledge, not wholly or in full measure, but very substantially.)
प्रसन्नता की बात है,कुछ ही देर में देश स्वतंत्र होने जा रहा है, हमारे देश के होने वाले पहले प्रधानमंत्री का भाषण चल रहा था। लेकिन उन्होंने जो बात कही थी - कि हमने नियति को मिलने का वचन दिया था उसको पूरा कर रहे हैं लेकिन पूरी तरह नहीं, बहुत हद तक? वह कोनसा वचन था?
ठीक 19 दिसंबर, 1929 को पंजाब की राजधानी लाहौर में रावि नदी के किनारे कांग्रेस के अधिवेशन में अखण्ड भारत को स्वतंत्र कराने का वचन दिया गया था,संकल्प किया था, ये नियति से वादा किया था।
लेकिन वही रावी का तट, 15 अगस्त को पराया हो गया। प्रभु श्रीराम के पुत्र लव के द्वारा बसाया हुआ लवपुर जिसे अब लाहौर कहते हैं, वह लाहौर आज भारत माता के पुत्रों के लिए पराया हो गया था। किस नियति की बात कर रहे हैं? कौनस वादा याद दिल रहे हैं? ??
15 अगस्त के दिन, जिस दिन 21 तोपों की सलामी दी जा रही थी, बड़ा शोर मच रहा था, तालियाँ बज रहीं थीं, और उसी समय लाखों लाशें कंकाल इधर से उधर हो रहे थे। हजारों हजार माताओं की गोद सुनी कर दी गई, सिंदूर मिटा दिया गया।
अपना सब कुछ छोड़ कर, अपनी मातृभूमि को छोड़कर, बहुत बड़ा समाज एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रहा था और स्थानांतरित होते समय अनेक प्रकार के गुंडों का उनपर आक्रमण होता था, उनको लूट लिया जाता था। माताओ बहनों को वहाँ से ले जाया जाता था, और सामूहित रूप से बलात्कार किया जाता था।
एक ओर स्वतंत्रता का बहुत बड़ा जश्न हो रहा था और एक ओर भयंकर मातम हो रहा था, ये दोनों चित्र एक साथ हमारे इतिहास में घटित हुए हैं। भारत माता आजाद हो गई लेकिन कैसी आजादी ?? --
"एक व्यक्ति अपने पिता को लेकर हॉस्पिटल गया। डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर से बाहर निकले और बोले, 'Congratulation! Operation is successful but Patient is no more.'. बेटा कहता है - ये कैसे संभव है, तो डॉक्टर कहता है - देखिए आपके पिताजी की जो नस थी, वो हमने जोड़ दी, पर आपके पिता जी की सांस बंद हो गई।" ऐसे ऑपरेशन को हम succesful operation कहेंगे?
और ऐसा ही ऑपरेशन 15 अगस्त 1947 के दिन इस देश के साथ हुआ था।
- इसके लिए कौन जिम्मेदार था ?
- ये देश का विभाजन हुआ कैसे ?
- किसके कहने से हुआ ?
- क्या इसको रोक जा सकता था ?
इन सब बातों पर हमको विचार करना चाहिए। इन सब बातों को सोचना चाहिए।
डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी ने - 1944-45 में जेल में एक पुस्तक लिखी "India Divided"(भारत का विभाजन),1946 में छपी, उसमें उन्होंने लिखा था - कि किस तरह भारत का विभाजन अप्राकर्तिक, अव्यावहारिक और असंभव है। लेकिन उस किताब की स्याही भी नहीं सुख पाई होगी, कि वही सारी बातें संभव होने लगीं थी। उन्हीं राजेन्द्र बाबू ने हमारे पहले राष्ट्रपति का पद सुशोभित किया था।
इसको गहराई से हमे देखना होगा कि ऐसी कौनसी बात थी जिसके कारण देश का विभाजन हुआ। ऐसी कौनसी मजबूरी थी जिसके कारण देश का विभाजन हुआ।
वस्तुनिष्ठ विश्लेषण
ये कोई एक दो व्यक्ति के बस की बात नहीं थी, एक दो दिन की बात नहीं थी, इसके लिए तो बहुत सारी योजनाएँ पहले से ही बनाई गई थी। जिसके कारण विभाजन हुआ। और इसमें हमारे नेताओं की बहुत बड़ी भूलें भी हुई हैं।
जब इतिहास को हम देखेंगे और इतिहास का वास्तुनिष्ठ विश्लेषण हम करेंगे तो कई महापुरुषों के नाम भी इसमें आते हैं। हमारे लिए श्रद्धेय हैं ऐसे लोगों के नाम भी इसमें आते हैं। पर एक दो गलतियों के कारण पूरे जीवन चरित्र पर दाग लगा देना - यह ठीक नहीं होगा ?
मनुष्य हैं, मनुष्य से गलतियाँ हो सकती हैं और होती हैं। ये हम जानते हैं।
कहते हैं - कि हम 1857 में ही स्वतंत्र होने वाले थे और स्वाधीनता संग्राम की सभी योजनाएँ भी एक दम सही थीं लेकिन फिर भी संग्राम सफल नहीं हो पाया।
"1857 का स्वाधीनता संग्राम क्यों असफल हुआ ?"- जब इस प्रश्न पर विचार किया जाता है तब कई कारणों के साथ 'निर्धारित समय से पहले युद्ध प्रारंभ हुआ' यह एक कारण सामने आता है। ऐसा क्यूँ हुआ इसका विश्लेषण करते समय अमर शहीद मंगल पाण्डे के कारण यह हुआ और अंग्रेजों को भनक लग गई कि कुछ तो बहुत बड़ा होने वाला है और उन्होंने स्वाधीनता के संग्राम को दबा दिया, कुचल दिया, आजादी 90 साल आगे चली गई। 1857 में आजाद होने वाले थे 1947 में हुए। परंतु जब ऐसा निष्कर्ष निकाला जाता है तब क्या इसका अर्थ यह होता है कि इससे मंगल पाण्डे का अनादर किया जा रहा है या वह देशद्रोही थे ? कदापि नहीं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। वह एक सच्चे देश प्रेमी, देश भक्त थे।
जिन्होंने भारत माता के चरणों पर अपना जीवन पुष्प समर्पित कर दिया उनके बारे में मन में आदर और श्रद्धा के अलावा और कौनसा भाव हो सकता है? परंतु क्या यह उचित होगा कि मंगल पाण्डे के लिए मन में आदरभाव है इसलिए उनकी भूलों के बारे में विचार ही न किया जाए। यह भी ठीक नहीं हैं।
इतिहास जैसा है वैसा का वैसा ही हम तक पहुंचना चाहिए और हमें आने वाली पीड़ी को भी देना चाहिए। बिना छेड़ छाड़ किए, बिना कुछ भी छिपाए। इतिहास से सीख लेने के लिए महापुरुषों की भूलों के बारे में भी विचार करना ही पड़ता है। उनके लिए आदरभाव यथावत रखते हुए, उनका सम्मान करते हुए। और इसी को कहते हैं इतिहास का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण।
हम कई बार बट चुके हैं
मित्रों,1947 का विभाजन कोई पहला और अंतिम विभाजन नहीं हैं, इतिहास देखतें हैं तो पता चलता है कि एक बहुत लंबे समय से हमने अपने इस देश को बढ़ते हुए नहीं देखा।
अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, तिब्बत, लंका, बर्मा, पाकिस्तान, बांग्लादेश बहुत सारे टुकड़े हमारी भारत माता के हो चुके हैं।
माँ को काटा जाता है, बाटा जाता है, माँ को कष्ट होता है, लेकिन यदि उसकी संतान के मन में कोई पीड़ा नहीं होती तो वह किस तरह की संतान है ?
हमने भारत माता को कटते हुए, बँटते हुए देखा। पर हमारे अंदर यदि कोई पीड़ा नहीं होती तो हम भारत माता की किस तरह की संतान हैं ?
माँ जिसकी चिंता करती है उसे पूत कहा जाता है, लेकिन जो माँ की चिंता करता है उसे सपूत कहा जाता है।
कांग्रेस की स्थापना
1857 की क्रांति के बाद ही, अग्रेजों को लगने लगा कि पूरे देश में हमारी इतनी अच्छी व्यवस्था होने के बाद भी, पूरे देश में इतनी अच्छी intelligence होने के बाद भी, ऐसे कौनसे कारण थे कि अंदर ही अंदर इतनी बड़ी क्रांति की योजना बन गई। इतना बड़ा आंदोलन होने वाला था और हमको भनक भी नहीं लगी। अंदर ही अंदर लावा सुलग रहा था और हमको पता ही नहीं चला।
इस क्रांति के बाद - देश के अंदर क्या चल रहा है और फिर दुबारा कोई ऐसा विद्रह न हो सके, इसके लिए भारतीयों के साथ मिलकर अंग्रेजों ने एक संगठन बनाया। जिसे आज हम congress के नाम से जानते हैं।
28 दिसंबर 1885, को A.O. Hume ने इस संगठन का निर्माण किया। इसमें जिन लोगों को चुना गया, वो जनता का प्रतिनिधित्व भी नहीं करते थे। Indian National Congress, इसमें National शब्द भी ह्यूम ने डाला ताकि ऐसा लोगों को लगे कि यह देश के लिए बनाई गई है।
यह खुद ह्यूम ने लिखा है। 1870 के बाद भारत में गुस्सा बढ़ रहा था - वासुदेव बलवंत फड़के, दक्कन दंगे। अंग्रेज डरे - "1857 जैसा विद्रोह फिर न हो जाए।" ह्यूम ने वायसराय डफरिन को चिट्ठी लिखी - "भारत में बहुत असंतोष है, अगर इसे निकालने के लिए एक नली (सेफ्टी वाल्व) नहीं बनाई तो ब्लास्ट होगा।" इसलिए कांग्रेस बनाई - ताकि पढ़े-लिखे लोग साल में एक बार मिलें, प्रस्ताव पास करें, और अंग्रेजों को बताएं - "देखो, इतना ही गुस्सा है समाज में।" और जिससे विद्रोह न हो। यह बात खुद कांग्रेस के इतिहासकार पट्टाभि सीतारमैया ने भी मानी है।
स्वाभाविक रूप से यह संस्था भारतीयों के बीच कार्य करती थी। और इसकी सहायता से देश में अंदर क्या चल रहा है,कोई आक्रोश तो नहीं, वो पता चलता था और अंग्रेज उसको दबाने के लिए, कुचलने के लिए,इन्ही लोगों का उपयोग कर लेते थे।
congress अंग्रेजों के लिए safety वॉल्व का कार्य करती थी। जैसे प्रेशर कुकर के ऊपर सैफ्टी वॉल्व होता है, कुकर में प्रेशर बढ़ने पर अपने आप ऊपर हो जाता है, कुकर के प्रेशर को कम करने का कार्य करता है, ठीक ऐसा ही कार्य काँग्रेस अंग्रेजों के लिए करती थी।
बंग भंग आंदोलन
1857 की इस क्रांति में, हिन्दू और मुसलमान शुद्ध राष्ट्रभक्ति के आधार पर सब साथ मिलकर लड़े। अंग्रेजों का तो काम ही था, फूट डालो राज करो।
1905 में अंग्रेजों के द्वारा एक प्रयोग हुआ। बंग भंग किया गया। लॉर्ड करजन उस समय वायसराय थे। उसने बंगाल को दो हिस्सों में तोड़ने की कोशिश की।
कहा गया कि पश्चिमी बंगाल और पूर्वी बंगाल ऐसे दो राज्य बनेगे। जो मुस्लिम बहुल क्षेत्र था वो एक बंगाल और जो हिन्दू बहुत क्षेत्र था वह एक बंगाल। कहने को तो उन्होंने कहा कि शासकीय दृष्टि से काम करने के लिए हम ये कर रहे हैं परंतु समाज उनकी इस फूट डालो राज करो वाली रणनीति को समझ गया। समाज समझ गया कि इसका उद्देश्य हिन्दू और मुसलमानों को बांटने के लिए है। उस बंग भंग का भयंकर विरोध हुआ।
बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखा गया - "वन्दे मातरम"। ये वन्दे मातरम उस समय के सभी क्रांतिकारियों का और देश भर का ऐसा जय घोष बन गया कि वन्दे मातरम कहते से ही शरीर के अंदर ऐसी तरंग उठती थी और प्रत्येक व्यक्ति भारत माता के लिए कूद पड़ता था। चाहे हिन्दू हो या मुसलमान इस वन्दे मातरम को गा-गा कर आंदोलन में रहते थे। विशेषकर बंगाल में भयंकर विरोध हुआ, इस बंग भंग का।
ढाका के नवाब सलीमुल्लाह खान, वह स्वयं कहते थे कि ये अंग्रेजों का शैतानी कारनामा है।
मुस्लिम लीग की स्थापना
1905 में बंग भंग करके लॉर्ड करजन रिटाइर हो गया और उनके स्थान पर लॉर्ड मिन्टो आ गया था।
मिन्टो ने मोरले को एक पत्र लिखा - "हिन्दू और मुसलमानों के बीच जो खाई हम बढ़ाना चाहते हैं, वो तो धीरे-धीरे और कम हो रही है। इसलए मुसलमानों का एक बौद्धिक संगठन बनाया जाए। जिसमें इनको उकसाया जाए और हिंदुओं से दूर रखा जाए।"
इसके बाद ढाका के नवाब सलीमुल्लाह को बहुत बड़ी मात्रा में धन दिया गया, बहुत कम ब्याज पर। कई उपाधियाँ दी और किसी भी तरह से उनको अपनी ओर मिला लिया।
ऐसे ही मुसलमानों को मिलाकर एक समूह बनाया गया और उनसे अंग्रेजों ने कहा कि - हमने जो शासन लिया वह तो तुमसे लिया है और छोड़ करके जाएंगे तुमको देकर के जाएंगे। तुम क्यों हिंदुओं के साथ मिल रहे हो ? अंग्रेजों की इस जाल में कुछ मुस्लिम लोग फस गए।
1906 में मुसलमानों का एक प्रतिनिधि मण्डल लॉर्ड मिन्टो से मिलने के लिए जाता है और वहाँ अपनी कुछ मांगे रखता है।
पृथक निर्वाचन मंडल (Separate Electorate) हमारे लिए होना चाहिए। यानि ऐसा स्थान जहां मुस्लिम बहुल है वहाँ केवल मुसलमान ही चुनाव लड़ेगा और केवल मुसलमान ही वोट देगा। voter केवल मुसलमान होगा अन्य कोई वोटर नहीं होगा।
अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' की नीति यहाँ बेहद सफल रही। लॉर्ड मिन्टो ने राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के लिए इस मुस्लिम समूह को बढ़ावा दिया।
30 दिसंबर 1906 को ढाका में, नवाब सलीमुल्लाह के महल में। इन्हीं मुसलमानों को बुलाकर एक अधिवेशन किया जाता है। उसी में मुस्लिम लीग की स्थापना होती है। जिसका अध्यक्ष आगा खां को बनाया जाता है।
और ये मुस्लिम लीग फिर बंग भंग आंदोलन का विरोध करने लगती है। लेकिन बंग भंग आंदोलन को लेकर लोगों में इतना उत्साह था कि 2011 में अंग्रेजों को बंग भंग वापस लेना पड़ता है और मुस्लिम लीग पूरी तरह से निष्क्रिय और प्रभावहीन हो जाती है।
हमारे नेताओं का अंग्रेजों के जाल में फंसना
ऐसे समय में मौका था कि इस मुस्लिम लीग को शुद्ध राष्ट्र भक्ति के मार्ग पर लाया जाए। इनसे यदि बात की जाए तो राष्ट्र भक्ति के आधार पर बात की जाए। लेकिन उस समय ये हमारे नेताओं से भूल हो गई। क्योंकि वे अंग्रेजों के जाल में फस चुके थे।
अंग्रेजों ने हिंदुओं से कहा - "तुम हिन्दू और मुस्लिम साथ में मिलके आजादी मांग लो।हम आजादी दे देंगे।"
और मुसलमानों से कहा - "मुसलमानों से लिया हुआ राज्य तो हम मुसलमानों को वापस देकर जाएँगे तुम क्यूँ हिंदुओं के साथ
मिलते हो।"
हमारे नेताओं ने मुस्लिम लीग के अधिवेशनों में जाना चालू कर दिया। इससे हुआ ये - जो मुस्लिम लीग मृत अवस्था तक पहुँच गई थी, उसमें प्राण डालने का काम हमारे नेताओं ने कर दिया।
1916 में लखनऊ में, कॉंग्रेस और मुस्लिम लीग का संयुक्त अधिवेशन होता है। इसमें लखनऊ समझौता पारित किया जाता है। और इसी समय विभाजन का बीज अंकुरित होता है। जो मुस्लिम लीग प्रभावहीन और निराश होकर बैठ गई थी। वह फिर से जागृत हो जाती है। मुस्लिम लीग की मांगे बढ़ने लगती हैं और द्विराष्ट्र का सिद्धांत वहाँ पर लागू हो जाता है।
इस देश में हिन्दू भी रहता है, मुसलमान भी रहता है। लेकिन दो राष्ट्र नहीं हैं ये, राष्ट्र तो एक ही है। बात होनी चाहिए थी, शुद्ध राष्ट्रभक्ति और संस्कृति के आधार पर। परंतु दुर्भाग्य से ये द्वि राष्ट्र का सिद्धांत स्वीकार किया गया कि यहाँ हिन्दू राष्ट्र भी है और मुस्लिम राष्ट्र भी है।
मिली जुली संस्कृति है, गंगा जमुनी सांकृति कहा गया। संस्कृति मिलीजुली नहीं होती, संस्कृति यानि जीवन जीने की पद्धति होती है। गंगा जमुनी संस्कृति कुछ नहीं होती - क्योंकि गंगा में भागीरथी मिलती है, अलकनंदा मिलती है,यमुना मिलती है, सरस्वती मिलती है लेकिन आगे चलकर वह गंगा ही कहलाती है।
1857 की क्रांति में और 1905 के बंग भंग में भी हिन्दू मुसलमान शुद्ध राष्ट्र भक्ति के आधार पर साथ मिलकर लड़े। लेकिन 1911 के बाद से मुसलमानों का तुष्टीकरण चालू किया क्योंकि अंग्रेजों के जाल में फंस गए।
1916 के अधिवेशन से उनकी कई प्रकार की मांगों को मानना शुरू कर दिया।
लोकमान्य तिलक ने यह कहा कि "हिन्दू और मुसलमान यह दो राष्ट्र हैं। और हमको मिलकर बात करनी चाहिए।" मिलकर बात करेंगे अर्थात शर्तों के आधार पर बात करना चालू कर दिया। इसपर मुस्लिम लीग ने अपनी शर्तें बढ़ाना चालू कर दिया।
अपने देश पर कोई आक्रमण करे और प्रधानमंत्री देश के लोगों से आवाहन करें। तो यदि उस संकट के समय कोई समूह ये कहे कि हमारी ये-ये इतनी-इतनी मांगे हैं इनको पूरा करेंगे तो हम तुम्हारे साथ हैं, तब हम सहयोग देंगे। यह बात निंदनीय है और सहन करने योग्य नहीं। इस संकट की घड़ी में प्रत्येक को साथ देना पड़ेगा और बिना शर्तों के साथ देना पड़ेगा। यही उस समय होना भी चाहिए था लेकिन दुर्भाग्य से यह हुआ नहीं।
लोकमान्य तिलक ने तो ये भी कहा "luck now" अर्थात लखनऊ, भारत का भाग्य उदय अब होने वाला है। इससे हुआ ये कि समाप्त होने वाली मुस्लिम लीग फिरसे उत्साह में आ गई क्योंकि congress उसको पूछने लगी, वजन देने लगी।
खिलाफत आंदोलन
1914 में प्रथम विश्वयुद्ध प्रारंभ होता है जो 1918 तक चला, उसमें तुर्की अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ा। इसमें अंग्रेज विजय होते हैं, तुर्की को हरा देते हैं और तुर्की के सुल्तान जिसे पूरे विश्व के मुसलमान अपना खलीफा मानते थे उसे बेबस, बिना साम्राज्य का और बिना किसी धार्मिक शक्ति का एक कैदी राजा बना दिया था।
इससे विश्व के सभी मुसलमानों में अंग्रेजों के विरुद्ध बड़ा गुस्सा भर गया। विशेषकर भारत के मुसलमानों ने अंग्रेजों के विरुद्ध खिलाफत आंदोलन चलाया कि तुर्की के खलीफा को उसकी ताकत वापस लौटाई जाए। मुंबई में अली बंधुओं (मोहम्मद अली और शौकत अली) ने 'अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी' की स्थापना की। वास्तव में इसका भारत की स्वतंत्रता से कोई लेना देना नहीं था।
बड़ी बात तो ये है कि जिसे पाकिस्तान का जनक कहा जाता है - मोहम्मद अली जिन्नाह। वह भी इस खिलाफत आंदोलन के विरुद्ध था। लेकिन गांधी जी की आँखों पर पर्दा लगा हुआ था कि जब तक हिन्दू और मुसलमान साथ नहीं आते तब तक इस देश को आजादी नहीं मिलेगी।
खिलाफत आंदोलन का समर्थन गांधी जी ने करना चालू कर दिया। उस समय के कई प्रमुख नेताओं ने गांधी जी को रोकने का भी प्रयास किया, समझाने का भी प्रयास किया। लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल,मोहम्मद अली जिन्ना,चितरंजन दास ऐसे कई लोगों ने विरोध किया। परंतु गांधी जी कलकत्ता के अधिवेशन में गए और वे अधिक लोकप्रिय थे इसलए इस खिलाफत आंदोलन को अधिक समर्थन मिलता गया और यह बड़ गया। गांधी जी ने इसे असहयोग आंदोलन से भी जोड़ दिया। इस खिलाफत आंदोलन का स्वरूप बहुत बड़ा कर दिया ।
मुस्तफा कमाल पाशा ने अंग्रेजों और उनके सहयोगी देशों को युद्ध में हराकर खुद सत्ता हासिल कर ली थी। उसने 1924 में खलीफा पद को ही हटा दिया। जब शौकत अली और अन्य नेताओं ने पत्रों और टेलीग्राम के माध्यम से पाशा से खलीफा पद को न हटाने की गुहार लगाई, तो कमाल पाशा ने स्पष्ट और कड़ा जवाब भेजा कि "तुर्की का यह फैसला अंतिम है और इसमें किसी बाहरी देश का दखल स्वीकार्य नहीं है।" इस प्रकार भारत के मुसलमानों को फटकार लगाई। उसके बाद यह आंदोलन समाप्त हो गया।
और इसका परिणाम क्या हुआ ? वर्ष 1920 में जब खिलाफत आंदोलन अपने चरम पर था, तब कुछ बड़े उलेमाओं और मुस्लिम विद्वानों (जैसे मौलाना अब्दुल बारी और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद) ने एक धार्मिक आदेश (Fatwa) जारी किया। इस फतवे में कहा गया - भारत अब 'दार-उल-हरब' (यानी युद्ध की भूमि या ऐसी जगह जहाँ इस्लाम सुरक्षित नहीं है) बन चुका है। इसलिए मुसलमानों को यह देश छोड़कर किसी मुस्लिम देश (जैसे अफगानिस्तान) चले जाना चाहिए, जिसे 'हिजरत आंदोलन' (Hijrat Movement of 1920) कहा जाता है।
लगभग 18,000 से अधिक भारतीय मुसलमान इस फतवे और धार्मिक भावना के कारण भारत छोड़कर निकाल गए। जब हजारों की संख्या में मुस्लिम देशों के पास पहुंचे ये पहुचे तो उन्होंने अपनी देश की सीमाएँ इनके लिए बंद कर दीं और प्रवासियों को वापस भारत खदेड़ दिया।
मोपला विद्रोह एवं शुद्धि आंदोलन
इसके बाद मोपला विद्रोह (Moplah Rebellion) जिसे 'मालाबार विद्रोह' भी कहा जाता है, ऐसी भयंकर घटनाएँ इस देश में घटित हुई। - ब्रिटिश और गैर-सरकारी ऐतिहासिक रिकॉर्ड (जैसे एनी बेसेंट और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के लेखों) के अनुसार, विद्रोहियों ने बड़े पैमाने पर निर्दोष हिंदुओं की हत्याएं कीं, महिलाओं पर अत्याचार किए बलात्कार किया, सैकड़ों हिंदू मंदिरों को तोड़ा और हजारों लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन करवाया।
सावरकर द्वारा लिखित मोपला पुस्तक पढ़ना चाहिए। किस प्रकार के दंगे हुए इस देश में।
इतना सब कुछ होने के बाद भी हमारे नेता इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे, स्वामी श्रद्धानन्द जी वो भी इस बात के लिए सहमत थे, सरदार पटेल, लोक मान्यतिलक ये सब सहमत थे। कि जब तक हिन्दू मुसलमान एक नहीं होता तब तक स्वतंत्र नहीं होंगे।
मोपला में और उसके बाद भी मसलमनो ने बहुत सारे लोगों को मुसलमान बनाना शुरू किया। बहुत भारी संख्या में हिंदुओं को मुसलमान बनाने लगे। स्वामी श्रद्धानन्द जी को इसकी चिंता हुई और उन्होंने फिर पुनर्वापसी का कार्य शुरू किया, जिनको जबरन मुसलमान बनाया गया उनको वापस हिन्दू बनाने लगे, घर वापसी का कार्य चालू किया। अनेक हिंदु जो मुसलमान बने उनको वापस हिन्दू बनाने लगे। उन्होंने 'शुद्धि आंदोलन' (Shuddhi Movement) चलाया।
मुस्लिम कट्टरपंथियों का एक वर्ग उनके इस कार्य से अत्यधिक नाराज था। 23 दिसंबर 1926 को स्वामी श्रद्धानंद जी काफी बीमार थे और अपने कमरे में बिस्तर पर आराम कर रहे थे। अब्दुल रशीद नाम का एक युवक उनके घर पहुंचा और अपने कंबल के भीतर छुपाई हुई पिस्तौल निकाली और बिस्तर पर लेटे हुए बीमार स्वामी जी के सीने में बेहद करीब (Point-blank range) से दो गोलियां दाग दीं। स्वामी जी की मौके पर ही मृत्यु हो गई।
इसके बाद अब्दुल रशीद को गिरफ्तार किया जाता है। कट्टरपंथी मुस्लिम समाज ने अब्दुल रशीद को बचाने और उसका समर्थन करने का पूरा प्रयास किया था। उसे एक अपराधी के बजाय अपने धर्म के रक्षक के रूप में सिद्ध करने का प्रयास किया। कांग्रेस के बड़े नेता और प्रसिद्ध बैरिस्टर आसफ अली ने अदालत में अब्दुल रशीद का केस लड़ा।
अब्दुल रशीद को बचाने के तमाम प्रयास जब ब्रिटिश अदालत के सामने विफल हो गए और 1927 में उसे फांसी दे दी गई, तब मुस्लिम समाज के उग्र वर्ग का समर्थन खुलकर सड़कों पर दिखा। दिल्ली में अब्दुल रशीद के शव (पार्थिव शरीर) को लेने और उसके जनाजे में शामिल होने के लिए हजारों की संख्या में मुसलमानों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी। जनाजे के दौरान उसे एक सामान्य हत्यारे या अपराधी के रूप में विदा नहीं किया गया, बल्कि भीड़ द्वारा उसे 'गाज़ी' (इस्लाम का योद्धा) और 'शहीद' कहकर नारे लगाए जा रहे थे। : स्वामी श्रद्धानंद जी की हत्या के बाद जब अब्दुल रशीद को अंग्रेजों द्वारा फांसी दी गई, तब देवबंद (उत्तर प्रदेश) के प्रसिद्ध इस्लामिक मदरसे 'दारुल उलूम' के छात्रों और प्रोफेसरों ने अब्दुल रशीद की रूह की शांति के लिए कुरान का 5 बार पूरा पाठ (Complete Recitation) किया था। इसके साथ ही उन्होंने रशीद के लिए प्रतिदिन सवा लाख (1,25,000) कुरान की विशिष्ट आयतों का पाठ करने की योजना भी बनाई थ। मदरसे में सामूहिक रूप से यह विशेष प्रार्थना (दुआ) की गई थी कि: "अल्लाह सर्वशक्तिमान इस मरहूम (मृतक/शहीद) अब्दुल रशीद को जन्नत के सर्वोच्च स्थान 'आला-ए-इल्लीयीन' (सातवें आसमान की चोटी) पर जगह अता फरमाए।"
हत्या के तुरंत बाद असम के गुवाहाटी में कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन(दिसंबर 1926) चल रहा था। वहां महात्मा गांधी ने एक विशेष शोक प्रस्ताव पेश किया और इसकी कड़ी निंदा की। गांधी जी ने कहा, "स्वामी श्रद्धानंद जी की हत्या से देश को एक अपूरणीय क्षति हुई है। वे एक सच्चे देशभक्त और बहादुर सन्यासी थे।" फिर गांधी जी ने रशीद को "भाई" कहकर संबोधित किया था और कहा था कि वे उसे स्वामी जी की हत्या का असली दोषी नहीं मानते, बल्कि असली दोषी वह नफरत का माहौल है जिसने उसके दिमाग को भ्रष्ट किया।
तुष्टीकरण इस प्रकार से चल रहा था कि दोषी को भी दोषी कहने के लिए तैयार नहीं थे। गांधी जी भी अब्दुल रशीद के बचाव पक्ष में खड़े थे।
इस बयान के कारण हिंदू महासभा और आर्य समाज के नेताओं ने गांधी जी पर तुष्टिकरण (Appeasement) और रशीद का परोक्ष रूप से बचाव करने का गंभीर आरोप लगाया और उनकी आलोचना की।
पंडित मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय और वीर सावरकर जैसे हिंदू नेताओं ने इस हत्याकांड पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया। उन्होंने इसे केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं, बल्कि हिंदू समाज और सनातन धर्म के पुनरुत्थान (शुद्धि आंदोलन) पर एक कायरतापूर्ण हमला बताया। मालवीय जी ने इसके विरोध में देशव्यापी शोक सभाएं बुलाईं और कांग्रेस की 'तुष्टिकरण' की नीति की आलोचना की।
इस घटना से डॉ. भीमराव अंबेडकर अत्यधिक आहत और परेशान हुए थे। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'थॉट्स ऑन पाकिस्तान' (Thoughts on Pakistan) में 30 नवंबर 1927 के 'The Times of India' अखबार की रिपोर्ट का हवाला देते हुए इस घटना की कड़ी निंदा की थी। अंबेडकर जी का कहना था कि हत्यारे को कानूनन सजा तो मिल गई, लेकिन चिंता की बात यह है कि मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवी और प्रभावशाली लोग उस हत्यारे की निंदा करने के बजाय उसके लिए धार्मिक अनुष्ठान कर रहे हैं और उसे 'शहीद' का दर्जा दे रहे हैं।
गांधी जी ने अब्दुल रशीद को भाई कहा और दोष परिस्थिति को दिया लेकिन जब : फरवरी 1931 में देश के वरिष्ठ नेता पंडित मदन मोहन मालवीय ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी को रुकवाने के लिए ब्रिटिश वायसराय को भेजने हेतु एक आधिकारिक 'दया याचिका' (Mercy Petition) तैयार की थी। इस पर मालवीय जी देश के सभी बड़े नेताओं के हस्ताक्षर (Sign) करवा रहे थे ताकि अंग्रेजों पर चौतरफा दबाव बने। जब यह याचिका महात्मा गांधी के पास लाई गई, तो गांधी जी ने इस कानूनी दया याचिका पर हस्ताक्षर करने से साफ मना कर दिया। उनका मानना था कि वे अपने 'अहिंसा के सिद्धांत' (Creed of Non-violence) के कारण किसी ऐसे व्यक्ति के लिए आधिकारिक रूप से कानूनी माफी नहीं मांग सकते जो सशस्त्र क्रांति (हिंसा) में शामिल था।
गांधी जी का बहुत योगदान रहा है देश के लिए, और उनका सम्मान हम आज भी करते हैं। लेकिन मनुष्य होने के कारण उनसे और कई उस समय देश का नेतृत्व करने वालों से कई बड़ी भूलें भी हुई हैं।
देदी हमे आजादी बिना खड़ग बिना ढाल (लोकप्रिय गीत)
देदी हमे आजादी बिना खड़ग बिना ढाल, यह बहुत ही लोकप्रिय गीत है। लेकिन ये गीत बहुत बड़ा झूठ है और अपमान भी करता है उन वीरों का जिन्होंने इस देश के लिए बलिदान दिया। इस देश को स्वतंत्रता कुछ लोगों ने नहीं दिलाई या रक्त की एक बूंद बहाए बिना हमे स्वतंत्रा मिली है ऐसा भी नहीं हैं। बहुत बड़ा संघर्ष इस देश के लोगों ने किया तब 1947 में स्वतंत्र हुए।
- जलियावाला बाघ हत्याकाण्ड हो गया।
- झांसी की रानी बलिदान हो गई।
- भगत सिंह, मंगलपाण्डे, खुदीराम बॉस, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बॉस, चाफेकर बंधु
- सावरकर - जिन्हें दो आजन्म कारावास की सजा मिली।
केवल कुछ लोगों को स्वतंत्रा का श्रेय देना उचित नहीं हैं। जिसने शस्त्र के साथ भाग लिया उसका भी योगदान था, जो बिना शस्त्र के सहयोग करता था उसका भी योगदान था और जो ईश्वर के सामने इस देश के मंगल के लिए प्रार्थना करता था उसका भी योगदान था।
भारत विभाजन की मांग
1929 में लाहौर अधिवेशन में जो अखण्ड भारत की बात कही थी, वह मुस्लिम लीग को पसंद नहीं आती और उसके बाद प्रसिद्ध दार्शनिक और कवि मोहम्मद इकबाल ने पहली बार यह विचार रखा था कि भारत के उत्तर-पश्चिम में स्थित मुस्लिम-बहुमत प्रांतों को मिलाकर एक स्वायत्त (Autonomous) क्षेत्र बनाया जाना चाहिए।
1933 ('अभी या कभी नहीं' घोषणापत्र): कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के एक छात्र चौधरी रहमत अली ने एक पर्चा (Pamphlet) जारी किया जिसका शीर्षक था— 'Now or Never' (अभी या कभी नहीं)। इसी पर्चे में उन्होंने पहली बार 'PAKISTAN' शब्द का नामकरण किया था।
1937 के चुनावों में मुस्लिम लीग को बहुत बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा, कई मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी हार का सामना करना पड़ा।
एक बहुत बड़ी ऐसी संख्या थी जो इस विभाजन को स्वीकार नहीं कर रही थी। मुस्लिम लीग की बुरी तरह हार हुई, इससे यह समझ आता है कि मुस्लिम लीग के विचारों से कोई सहमत नहीं था।
सितंबर 1939 से द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया।
(19-20 मार्च 1940) बिहार के रामगढ़ में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ था, जिसकी अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आजाद ने की थी। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित कर साफ कर दिया कि वह भारत की अखंडता और एकता से कोई समझौता नहीं करेगी।
मौलाना आजाद ने एक राष्ट्रवादी मुस्लिम के रूप में घोषणा की कि भारत के मुसलमान इस देश की साझी संस्कृति का हिस्सा हैं और वे विभाजन के इस विचार को पूरी तरह नकारते हैं।
23 मार्च 1940 को लाहौर में मुस्लिम लीग का वार्षिक अधिवेशन हुआ। इसकी अध्यक्षता जिन्ना ने की। फजलुल हक ने एक प्रस्ताव पेश किया जिसे लाहौर प्रस्ताव कहा गया। इस प्रस्ताव में मांग की गई कि भारत के उत्तर-पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों के मुस्लिम बहुल प्रांतों को मिलाकर एक स्वतंत्र और संप्रभु राज्य का गठन किया जाए। हालांकि इस प्रस्ताव में 'पाकिस्तान' शब्द का सीधा जिक्र नहीं था, लेकिन इसने आगे चलकर पाकिस्तान के निर्माण का आधार तय किया।
गांधीजी ने इसे एक "नैतिक त्रासदी" (moral tragedy) कहा। उन्होंने 'हरिजन' अखबार में लिखा कि देश का विभाजन करने का मतलब भारत के दो टुकड़े करना नहीं, बल्कि शरीर को बीच से काटना है। उन्होंने जोर दिया कि भारत के हिंदू और मुस्लिम एक ही मिट्टी के सपूत हैं। उन्होंने कहा - 'If the Congress wishes to accept partition, it will be over my dead body'(अगर कांग्रेस विभाजन स्वीकार करना चाहती है, तो यह मेरी लाश पर होगा। जब तक मैं जीवित हूँ, मैं भारत के विभाजन के लिए कभी सहमत नहीं हूँगा।)
नेहरू ने इस प्रस्ताव को पूरी तरह अव्यावहारिक और "पागलपन" करार दिया। उन्होंने साफ किया कि कांग्रेस भारत के टुकड़ों में बंटने की बात को कभी स्वीकार नहीं करेगी। वे कहते थे कि यह 'fantastic nonsense'(विलक्षण मूर्खता) है और कहते थे - 'Those who talk of partition live in paradise of fools'(जो विभाजन की बात करते हैं वे मूर्खों के स्वर्ग में रहते हैं).
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने जिन्ना की इस मांग की तुलना दो भाइयों के बीच गाय के मालिकाना हक को लेकर होने वाले उस झगड़े से की, जिसमें गाय को जिंदा बांटने (यानी काटने) की बात कही जा रही हो।
यह सोचना गलत होगा कि उस समय के सभी मुस्लिम नेता पाकिस्तान की मांग के समर्थन में थे। मुस्लिम समुदाय का एक बहुत बड़ा और प्रभावशाली हिस्सा इस प्रस्ताव के सख्त खिलाफ था।
खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी): उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) के इस महान नेता और उनके संगठन 'खुदाई खिदमतगार' ने प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया। उनका मानना था कि यह कदम देश के मुसलमानों को बांटने और कमजोर करने की अंग्रेजों की चाल है।
अल्लाह बख्श सूमरो और आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस: सिंध के मुख्यमंत्री अल्लाह बख्श सूमरो ने अप्रैल 1940 में दिल्ली में 'आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस' का आयोजन किया। इसमें जमीयत उलेमा-ए-हिंद और मजलिस-ए-अहरार जैसे कई बड़े मुस्लिम संगठन शामिल हुए। इस सम्मेलन में लाहौर प्रस्ताव की कड़े शब्दों में निंदा की गई और भारत की अखंडता का समर्थन किया गया।
यूनियनिस्ट पार्टी (पंजाब): पंजाब के मुख्यमंत्री सर सिकंदर हयात खान, जिन्होंने खुद लाहौर प्रस्ताव का शुरुआती मसौदा तैयार करने में मदद की थी, जिन्ना के इस विभाजनकारी रूप से पीछे हट गए। उन्होंने पंजाब विधानसभा में बयान दिया कि वे ऐसे 'पाकिस्तान' के खिलाफ हैं जो भारत को टुकड़ों में बांटता हो।
राष्ट्रवादी मुस्लिम (Nationalist Muslims): मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे कांग्रेस के शीर्ष मुस्लिम नेताओं ने कहा कि इस्लाम किसी भौगोलिक विभाजन की वकालत नहीं करता।
1940 के प्रस्ताव के बाद कांग्रेस ने पूरी ताकत से विभाजन की मांग का विरोध किया, जिसे वे आने वाले कई सालों तक एक "असंभव और मूर्खतापूर्ण" विचार मानते रहे।
आज़ाद हिंद फ़ौज (INA)
इसके बाद लोगों ने अखण्ड भारत के लिए ही सत्यागृह और भारत छोड़ो जैसे आंदोलनों में भाग लिया।
अक्टूबर 1943 में उन्होंने सिंगापुर में 'आज़ाद हिंद सरकार' (Arzi Hukumat-e-Azad Hind) की स्थापना की। उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान संभाली और "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा" का नारा देकर भारत की पूर्वी सीमा (इंफाल और कोहिमा) पर अंग्रेजों के खिलाफ सीधी सैन्य लड़ाई शुरू की।
सितंबर 1944 में गांधी और जिन्ना के बीच लंबी बातचीत हुई, लेकिन जिन्ना एक पूर्ण और संप्रभु पाकिस्तान की मांग पर अड़े रहे और यह वार्ता पूरी तरह विफल हो गई।
अंग्रेजों ने सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) के तीन अफसरों (प्रेम सहगल, शाहनवाज़ खान और गुरबख्श सिंह ढिल्लों) पर दिल्ली के लाल किले में देशद्रोह का मुकदमा चलाया। (नवंबर 1945)
इस मुकदमे ने पूरे देश में राष्ट्रवाद की एक अभूतपूर्व लहर पैदा कर दी। पहली बार हिंदू, मुस्लिम और सिख पूरी तरह एकजुट हो गए। जवाहरलाल नेहरू ने सालों बाद वकील का चोगा पहना और सर तेजबहादुर सप्रू व भूलाभाई देसाई के साथ मिलकर इन सैनिकों का केस लड़ा। भारी जन-आक्रोश को देखते हुए वायसराय को इन सैनिकों की सजा माफ करनी पड़ी।
देश की अलग-अलग घटनाएँ बताती हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय के अंदर केवल अखण्ड भारत का ही स्वप्न रहा।
1945-46 के प्रांतीय चुनाव
भले ही ब्रिटेन द्वितीय विश्व युद्ध जीत गया था, लेकिन छह साल तक चली इस भयंकर लड़ाई ने उसकी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह तबाह कर दिया था। ब्रिटेन पर अमेरिका का भारी कर्ज हो चुका था। उसके पास अब इतने संसाधन और पैसा नहीं बचा था कि वह भारत जैसे विशाल देश में अपनी सेना, पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था का खर्च उठा सके।
जुलाई 1945 में ब्रिटेन में लेबर पार्टी के क्लीमेंट एटली प्रधानमंत्री बने। उन्होंने भारत की राजनीतिक स्थिति और नई 'संविधान सभा' (Constituent Assembly) के गठन के लिए चुनाव कराने का फैसला किया।
मुस्लिम लीग ने इसे एक धार्मिक युद्ध की तरह लड़ा। मोहम्मद अली जिन्ना और लीग का केवल एक ही मुख्य मुद्दा था—एक अलग मुस्लिम राष्ट्र (पाकिस्तान) का निर्माण। उन्होंने नारा दिया कि "इस्लाम खतरे में है" और मुसलमानों को यह समझाया कि यदि वे लीग को वोट नहीं देंगे, तो वे आज़ाद भारत में हिंदुओं के गुलाम बनकर रह जाएंगे। लीग ने इस चुनाव को खुद के 'मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि पार्टी' होने के दावे को साबित करने का जरिया बनाया।
1937 के चुनावों में केवल 109 सीटें जीतने वाली मुस्लिम लीग ने इस बार अभूतपूर्व जीत हासिल की। इस जीत ने अंग्रेजों और कांग्रेस के सामने यह साबित कर दिया कि अब लीग ही भारत के मुसलमानों की मुख्य आवाज बन चुकी है।
कांग्रेस का मुख्य एजेंडा 'अखंड और अविभाज्य भारत' (United India) और ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वतंत्रता था।
भारत के 11 प्रांतों में से 8 प्रांतों में कांग्रेस ने अपनी सरकारें बनाईं।
कांग्रेस की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली जीत उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP - जो अब पाकिस्तान में है) में हुई। यह एक मुस्लिम बहुल इलाका था, लेकिन वहां खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी) और उनके भाई डॉ. खान साहब के प्रभाव के कारण मुस्लिम लीग हार गई और कांग्रेस ने अपनी सरकार बनाई।
सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों पर जब लाल किले में मुकदमा चला, तो भारतीय सैनिकों के भीतर सोया राष्ट्रवाद जाग उठा।
फरवरी 1946 में बॉम्बे में भारतीय नौसैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह कर दिया। इसके बाद वायुसेना और पुलिस ने भी कई जगह हड़तालें कीं। अंग्रेजों को समझ आ गया कि जिस बंदूक के दम पर वे भारत पर राज कर रहे थे, अब उसकी नली उनकी ही तरफ मुड़ चुकी है।
पूरी तरह स्थिति बन गई कि अंग्रेजों के पास देश छोड़कर जाने के अलावा दूसरा विकल्प ही नहीं बचा। सब कुछ भारत के पक्ष में था लेकिन फिर भी भारत अखण्ड रूप नहीं ले सका।
भारत का विभाजन
लॉर्ड माउंटबेटन ने मार्च 1947 में भारत के आखिरी वायसराय के रूप में कार्यभार संभाला। आते ही उन्होंने महसूस किया कि कैबिनेट मिशन फेल हो चुका है, अंतरिम सरकार प्रशासनिक गतिरोध के कारण ठप है और देश भीषण सांप्रदायिक दंगों की वजह से गृहयुद्ध की कगार पर खड़ा है।
माउंटबेटन ने बेहद चालाकी, कूटनीतिक दबाव और अपनी व्यक्तिगत साख का इस्तेमाल करके तीनों नेताओं को विभाजन के लिए राजी किया।(पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मोहम्मद अली जिन्ना)
जब सभी नेता एक निश्चित रूपरेखा पर सहमत हो गए, तो 3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के विभाजन और आजादी की आधिकारिक योजना पेश की।
3 जून 1947 को विभाजन की योजना (माउंटबेटन प्लान) की घोषणा के ठीक अगले दिन, यानी 4 जून 1947 को दिल्ली में एक ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों के सामने माउंटबेटन ने अचानक ऐलान कर दिया कि भारत को 30 जून 1948 में नहीं, बल्कि इसी साल 15 अगस्त 1947 को आज़ाद और विभाजित कर दिया जाएगा।
15 अगस्त 1947 को भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान अस्तित्व में आया। 1947 में भारत का विभाजन मुख्य रूप से धर्म के आधार पर ही हुआ था। इस विभाजन की नींव 'द्वि-राष्ट्र सिद्धांत' (Two-Nation Theory) पर टिकी थी, जिसके तहत भारत को दो धार्मिक पहचानों—हिंदू बहुल भारत और मुस्लिम बहुल पाकिस्तान—में बांट दिया गया।
गांधी जी इस ऐतिहासिक जश्न में शामिल होने के लिए दिल्ली में नहीं थे। वे उस समय कोलकाता (तब कलकत्ता) के बेलियाघाटा में थे, जहां वे विभाजन के कारण भड़के हिंदू-मुस्लिम दंगों को शांत करने के लिए प्रार्थना और उपवास (अनशन) कर रहे थे।
हमने 1200 वर्षों तक संघर्ष किया कुछ और वर्ष संघर्ष करते क्योंकि अंग्रेजों की मजबूरी थी कि वह देश को छोड़कर जाए।
आजादी के कई सालों बाद मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार लियोनार्ड मोस्ले (Leonard Mosley) को दिए गए एक इंटरव्यू में अपनी मजबूरी और कड़वे सच को स्वीकार करते हुए कही गई उनकी एक बेहद निजी और ईमानदार स्वीकारोक्ति (Admission) थी।
नेहरू जी का वह वास्तविक और ऐतिहासिक कथन इस प्रकार है:"सच तो यह है कि हम थक चुके थे, और हमारी उम्र भी ढल रही थी (हम बूढ़े हो रहे थे)। हममें से बहुत कम लोग ऐसे थे जो दोबारा जेल जाने की संभावना को झेल सकते थे—और अगर हम एक अखंड भारत की जिद पर अड़े रहते जैसा कि हम चाहते थे, तो निश्चित रूप से जेल हमारा इंतजार कर रही थी। हमने पंजाब को आग में जलते देखा था और रोज हो रही मौतों के बारे में सुन रहे थे। विभाजन की योजना ने हमें एक रास्ता दिखाया और हमने उसे चुन लिया।"
अखण्ड भारत
अब क्या हो सकता है, अब थोड़े ही एक हो सकते हैं। यह सिर्फ अश्रद्धा है, यह सिर्फ तब है जब तक हम स्वयं को नहीं जानते। इतिहास में ऐसी कई घटनाएँ हैं, जो पहले असंभव लगती थी लेकिन बाद में संभव हो गई।
महर्षि अरविन्द ने कहा था - "भारत का विभाजन उसकी आध्यात्मिक नियति के विरुद्ध है, इसलिए यह अस्थायी है। भारत फिर अखण्ड होगा।"यह केवल भविष्यवाणी नहीं, यह हमारा संकल्प है।
जर्मनी
" द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी को दो भागों में बाँट दिया गया। एक बना पूर्वी जर्मनी, दूसरा पश्चिमी जर्मनी। बीच में बर्लिन शहर था। उस शहर के बीच में एक दीवार खड़ी कर दी गई। बर्लिन की दीवार। सोचिए, एक ही गली में रहने वाला परिवार बँट गया। एक भाई एक ओर, दूसरा भाई दूसरी ओर। एक ही भाषा, एक ही रक्त, एक ही संस्कृति, पर बीच में दीवार। 1961 में यह दीवार बनी और 28 वर्षों तक रही। लोग दीवार को देखकर रोते थे, पर लाँघ नहीं सकते थे। पर जर्मनी के लोगों ने अपने मन में दीवार नहीं बनने दी। उन्होंने कहा, यह दीवार राजनीति ने बनाई है, हमारे हृदय में जर्मनी एक ही है। और 9 नवंबर 1989 को वह दीवार अपने आप गिर गई। लोगों ने अपने हाथों से उसे तोड़ दिया। एक वर्ष के भीतर, 3 अक्टूबर 1990 को जर्मनी फिर से एक हो गया। 45 वर्षों तक बँटा हुआ देश, फिर से एक हो गया। कैसे? क्योंकि भूगोल बँटा था, मन नहीं बँटा था। यदि जर्मनी 45 वर्ष बाद एक हो सकता है, तो भारत, जिसकी संस्कृति हजारों वर्षों से एक है, वह अपनी सांस्कृतिक एकता का स्मरण क्यों नहीं कर सकता? जर्मनी की दीवार ईंट और सीमेंट की थी, जो टूट गई। हमारे बीच की दीवार तो केवल मानसिकता की है। उसे तोड़ना और भी सरल है। यही अखण्ड भारत का संकल्प है - दीवार को नहीं, सेतु को याद रखना।"
सोवियत संघ
" सोवियत संघ कितना बड़ा था? विश्व का सबसे बड़ा देश। बाल्टिक सागर से प्रशांत महासागर तक फैला हुआ। 15 गणराज्य उसमें थे। उसके पास विश्व की सबसे बड़ी सेना थी, सबसे अधिक परमाणु अस्त्र थे, विज्ञान था, सत्ता थी। पर 26 दिसंबर 1991 को वह एक दिन में टूट गया। 15 टुकड़ों में बिखर गया। क्यों? क्योंकि उसकी एकता विचारधारा पर टिकी थी, संस्कृति पर नहीं। वहाँ कहा गया - तुम्हारी भाषा छोड़ो, तुम्हारी संस्कृति छोड़ो, केवल एक विचारधारा मानो। रूस ने यूक्रेन की भाषा दबाई, कजाख की परंपरा दबाई, उज्बेक की पहचान दबाई। जब तक भय था, तब तक देश एक रहा। भय हटा और देश टूट गया। यही अंतर है सोवियत संघ और भारत में। भारत में 22 भाषाएँ हैं, सैकड़ों पंथ हैं, फिर भी हम एक हैं। क्यों? क्योंकि हमने कभी किसी पर अपनी भाषा थोपी नहीं। हमने कहा - विविधता में एकता। सोवियत संघ ने कहा - एक विचारधारा में एकता। एक विचारधारा टूटते ही देश टूट गया। इससे हमें दो शिक्षाएँ मिलती हैं। पहली - केवल सत्ता, सेना और विचारधारा से देश एक नहीं रहता। देश संस्कृति से एक रहता है। दूसरी - अखण्ड भारत का अर्थ सोवियत संघ जैसी राजनीतिक एकता नहीं। हम किसी पर अधिकार नहीं चाहते। हम केवल यह कहना चाहते हैं कि इस पूरे क्षेत्र की आत्मा एक है, संस्कृति एक है, उसे याद रखो। सोवियत संघ टूटा क्योंकि उसने संस्कृति को दबाया। भारत बिखर कर भी एक रहा, क्योंकि उसकी संस्कृति कभी मिटी नहीं। यही हमारी शक्ति है, यही हमारा संकल्प है।"
इज़राइल
ईसा पश्चात पहली और दूसरी शताब्दी में रोमनों ने यहूदियों को उनकी मूल मातृभूमि (यरूशलम और आस-पास के क्षेत्र) से
पूरी तरह खदेड़ दिया था। लगभग 2000 वर्षों तक यहूदी पूरी दुनिया में बिखरे रहे, प्रताड़ित हुए, लेकिन उन्होंने
अपनी मूल भूमि को कभी नहीं भुलाया। वे जब भी प्रार्थना करते थे, तो यरूशलम की ओर मुख करके कहते थे—"अगले वर्ष
यरूशलम में मिलेंगे।"
हिब्रू' (Hebrew) यहूदियों की प्राचीन भाषा थी, जो समय के साथ पूरी तरह बोलचाल से लुप्त हो चुकी थी और केवल
धार्मिक ग्रंथों तक सीमित थी। जब 1948 में आधुनिक इज़राइल की स्थापना हुई, तो उन्होंने अपनी इस प्राचीन 'मृत' भाषा
को पुनर्जीवित किया और उसे राष्ट्रभाषा बनाया। आज इज़राइल विज्ञान, तकनीक और राजनीति की पूरी शिक्षा हिब्रू में
देता है।
1948 में जब इज़राइल स्वतंत्र हुआ, तो उसके अगले ही दिन सात अरब देशों ने मिलकर उस पर आक्रमण कर दिया था। इज़राइल
के पास न तो बड़ी सेना थी और न ही पर्याप्त संसाधन। लेकिन वहां के प्रत्येक नागरिक ने 'राष्ट्र-प्रथम' की भावना के
साथ युद्ध लड़ा और विजय प्राप्त की। आज भी इज़राइल में हर नागरिक (महिला और पुरुष) के लिए सैन्य प्रशिक्षण
अनिवार्य है।
1857 का स्वाधीनता संग्राम असफल होने के बाद, स्वाधीनता असंभव लगने लगी थी। लेकिन 1947 में स्वाधीन हुए।
भारत विभाजन के कुछ वर्ष पहले तक, विभाजन हो सकता है ये बात असंभव लगती थी। तभी तो पं. जवाहरलाल नेहरू ने, विभाजन की मांग को "विलक्षण मूर्खता"(fantastic nonsense) कहा, और यह कहकर इस मांग की खिली उड़ाई कि "Those who talk of partition live in paradise of fools"(जो लोग विभाजन की बात करते हैं वे मूर्खों के स्वर्ग में रहते हैं।), परंतु 1947 में भारत का विभाजन हो गया।
इतिहास ऐसी असंभव लगने वाली बाटों के संभव होने से भर पद है। फिर भारत विभाजन को स्थापित सत्य क्यों मन जाए,यह क्यों माना जाए की हम फिर कभी एक नहीं होने। इच्छाशक्ति और प्रयत्नों के आधार पर, इसे भी बदला जा सकता है। यही विचार प्रत्येक भारतवासी का होना चाहिए।
आसिन्धु सिन्धु-पर्यन्ता, यस्य भारत-भूमिका। पितृभूः पुण्यभूश्चैव, स वै हिन्दुरिति स्मृतः॥
सिन्धु नदी से लेकर हिन्द महासागर तक फैली भारत भूमि को जो अपनी बाप-दादों की जमीन और अपने भगवानों की जमीन मानता है, वही हिन्दू है।
संकल्प
"हम भारत माता को पुनः अखण्ड, वैभवशाली और विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए अपना तन, मन, धन अर्पण करेंगे।"
भारत माता की जय