श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम अध्याय “अर्जुन विषाद योग” महाभारत युद्ध के आरम्भिक क्षणों का चित्रण करता है, जब युद्धभूमि में कौरव और पाण्डव सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं। हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र, दिव्य दृष्टि प्राप्त संजय से पूछते हैं कि धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में एकत्रित होकर दोनों पक्षों ने क्या किया।
संजय युद्धभूमि का दृश्य वर्णित करते हुए बताते हैं कि दुर्योधन पाण्डवों की विशाल सेना देखकर गुरु द्रोणाचार्य के पास जाता है और दोनों पक्षों के प्रमुख योद्धाओं का उल्लेख करता है। इसके पश्चात् भीष्म पितामह के शंखनाद के साथ सम्पूर्ण रणभूमि शंखों और रणवाद्यों की ध्वनि से गूँज उठती है।
भगवान श्रीकृष्ण के सारथ्य में अर्जुन अपना रथ दोनों सेनाओं के मध्य ले जाने का अनुरोध करते हैं ताकि वे युद्ध के लिए उपस्थित योद्धाओं को देख सकें। जब अर्जुन अपने गुरु, पितामह, बन्धु, मित्र तथा स्वजनों को युद्धभूमि में देखते हैं, तब उनके मन में करुणा, मोह और धर्मसंकट उत्पन्न हो जाता है।
अर्जुन विचार करते हैं कि ऐसे युद्ध से प्राप्त राज्य, सुख और विजय का कोई अर्थ नहीं रहेगा यदि उसके लिए अपने ही स्वजनों का विनाश करना पड़े। वे कुलधर्म के नाश, सामाजिक व्यवस्था के विघटन तथा पाप की आशंका व्यक्त करते हुए युद्ध करने से विरक्त हो जाते हैं।
अंततः गहन मानसिक विषाद से व्याकुल होकर अर्जुन अपना गाण्डीव धनुष नीचे रख देते हैं और रथ में बैठ जाते हैं। इसी अवस्था से भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य उपदेश का आरम्भ होने की भूमिका तैयार होती है। यही कारण है कि इस अध्याय को “अर्जुन विषाद योग” कहा जाता है।