Civil Procedure Code (CPC) 1908 की मुख्य विशेषताएं और जानकारी
- Civil Procedure Code, 1908 (CPC) भारत का प्रमुख दीवानी प्रक्रिया कानून है जो सिविल मामलों (जैसे संपत्ति विवाद, अनुबंध, पारिवारिक मामले आदि) के निपटारे की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।
- इसे 1908 में लागू किया गया था और समय-समय पर इसमें संशोधन किए गए हैं ताकि न्याय प्रणाली अधिक प्रभावी और आधुनिक बन सके।
- यह अधिनियम वाद (Suit) दायर करने, सुनवाई, साक्ष्य, निर्णय (Judgment) और डिक्री (Decree) की पूरी प्रक्रिया को निर्धारित करता है।
1. संरचना और धाराएं
- Sections: 158
- Orders: 51 Orders
- Rules: प्रत्येक Order के अंतर्गत विस्तृत नियम
2. प्रमुख प्रक्रिया
- Suit Institution: वाद दायर करने की प्रक्रिया
- Summons: प्रतिवादी को सूचना देना
- Pleadings: Plaint और Written Statement
- Evidence: साक्ष्य प्रस्तुत करना
- Judgment & Decree: न्यायालय का निर्णय और डिक्री
- Execution: डिक्री का पालन करवाना
3. महत्वपूर्ण सिद्धांत
- Res Judicata: एक ही मामले पर दोबारा मुकदमा नहीं चल सकता
- Res Sub Judice: लंबित मामले पर समान मुकदमा नहीं
- Natural Justice: निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार
4. महत्वपूर्ण प्रावधान
- Jurisdiction: न्यायालय का अधिकार क्षेत्र
- Appeal: उच्च न्यायालय में अपील का अधिकार
- Review: निर्णय की पुनः समीक्षा
- Revision: उच्च न्यायालय द्वारा सुधार
- Interim Relief: अस्थायी राहत (Stay, Injunction)
5. उद्देश्य
- दीवानी मामलों का व्यवस्थित और न्यायसंगत निपटारा
- न्याय प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाना
- दोनों पक्षों को समान अवसर प्रदान करना
6. आधिकारिक जानकारी
- Gazette of India
- eCourts Portal
दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908 – अध्यायवार अनुक्रमणिका
| भाग (PART) |
नाम (NAME) |
धारा (SECTION) |
|---|---|---|
| - | प्रारम्भिक Preliminary |
1 - 8 |
| I | साधारणतः वादों के विषय में Suits In General |
9 - 35B |
| II | निष्पादन Execution |
36 - 74 |
| III | आनुषंगिक कार्यवाहियां Incidental Proceedings |
75 - 78 |
| IV | विशिष्ट मामलों में वाद Suits In Particular Cases |
79 - 88 |
| V | विशेष कार्यवाहियां Special Proceedings |
89 - 93 |
| VI | अनुपूरक कार्यवाहियां Supplemental Proceedings |
94 - 95 |
| VII | अपीलें Appeals |
96 - 112 |
| VIII | निर्देश, पुनर्विलोकन और पुनरीक्षण Reference, Review And Revision |
113 - 115 |
| IX | ऐसे उच्च न्यायालयों के संबंध में विशेष जो न्यायिक आयुक्त के न्यायालय नहीं हैं Special Provisions Relating To The High Courts Not Being The Court Of A Judicial Commissioner |
116 - 120 |
| X | नियम Rules |
121 - 131 |
| XI | प्रकीर्ण Miscellaneous |
132 - 158 |
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कुल अध्याय – 11
अनुसूची – 1
प्रभावी तिथि – 1 जनवरी 1909
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Source: Government of India Acts, Official Gazettes and Public Legal Documents.
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Frequently Asked Questions (FAQs) about CPC 1908
नीचे CPC 1908 से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर दिए गए हैं:
1. CPC 1908 क्या है?
Civil Procedure Code (CPC), 1908 भारत का प्रमुख दीवानी प्रक्रिया कानून है, जो सिविल मामलों (जैसे संपत्ति विवाद, अनुबंध, पारिवारिक मामले आदि) के निपटारे की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।
2. CPC कब लागू हुआ?
Civil Procedure Code (CPC) 1908 में लागू किया गया था और तब से यह भारत में दीवानी मामलों के लिए लागू है।
3. CPC में कुल कितनी धाराएं हैं?
CPC में कुल 158 Sections और 51 Orders हैं, जिनमें प्रत्येक Order के अंतर्गत विस्तृत नियम (Rules) दिए गए हैं।
4. CPC किस प्रकार के मामलों पर लागू होता है?
CPC सिविल मामलों पर लागू होता है जैसे संपत्ति विवाद, अनुबंध विवाद, पारिवारिक मामले, धन वसूली और अन्य नागरिक विवाद।
5. CPC का मुख्य उद्देश्य क्या है?
CPC का मुख्य उद्देश्य दीवानी मामलों का व्यवस्थित, निष्पक्ष और पारदर्शी निपटारा सुनिश्चित करना है।
6. CPC में Res Judicata क्या है?
Res Judicata का अर्थ है कि एक ही मामले पर एक बार निर्णय हो जाने के बाद उसी विषय पर दोबारा मुकदमा नहीं चलाया जा सकता (Section 11 CPC)।
7. CPC में Res Sub Judice क्या है?
Res Sub Judice का अर्थ है कि यदि कोई मामला पहले से ही किसी न्यायालय में लंबित है, तो उसी विषय पर दूसरा मुकदमा नहीं चलाया जा सकता (Section 10 CPC)।
8. CPC में Decree और Judgment में क्या अंतर है?
Judgment न्यायालय द्वारा दिया गया कारणयुक्त निर्णय होता है, जबकि Decree उस निर्णय का औपचारिक परिणाम होता है, जिसके आधार पर अधिकारों का निर्धारण किया जाता है।
9. CPC में Appeal क्या होती है?
Appeal का अर्थ है कि किसी पक्षकार को निचली अदालत के निर्णय के खिलाफ उच्च न्यायालय में पुनः सुनवाई का अधिकार होता है।
10. CPC 1908 का अध्ययन क्यों जरूरी है?
CPC का अध्ययन कानून के छात्रों, वकीलों और प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे न्यायिक सेवा, UPSC आदि) की तैयारी करने वालों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत के दीवानी न्याय प्रणाली का आधार है।